सपने मेरे अधूरे नहीं


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मेरे सपने

मेरे हैं

मोर के पंख फैलाकर

एक मोर सी नाचती मैं

रात भर

जंगल में गहन खामोशी है लेकिन

इस खामोशी को तोड़ती

मेरे पैरों में बंधे घुंघरुओं की थाप

कोयल की कूक

सरगम के राग की हूक

सब साजों संग थिरक रहे

गीतों के बोल

उनकी लय, उनके शब्दों के मोती,

उनकी स्वर लहरियां,

उनका तन, उनका मन,

उनकी आत्मा,

उनका श्रृंगार,

उनसे बरसती एक रस बहार,

उनके मुखड़े, उनके अन्तरे, उनके टुकड़े,

उनका स्पर्श, उनका स्पंदन,

उनके कर्म, उनकी गति,

उनकी नियति, उनकी प्रगति,

उनकी सदगति,

उनके साथ घटित एक एक

रचनाक्रम सब मेरे हैं

उनसे जुड़े सारे स्वप्न मेरे हैं

उनमें कहीं तेरा भी अंश है

तू भी मेरा है

अधूरा नहीं

पूर्ण रूप से मेरा है

सपने भी मेरे अधूरे नहीं

पूर्ण हैं

उसमें समाहित यह सारी कायनात

उसका कण कण

प्रभु धुन

मैं सबकी और

सब कुछ मेरा है।


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