चक्रव्यूह तो चक्रव्यूह है


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जीवन सरल है

इसको जटिल हम स्वयं या

कई बार हमारी विषम और विपरीत

परिस्थितियां बनाती हैं

जीवन के चक्रव्यूह के रचनाकार

हम काफी हद तक खुद होते हैं तो

प्रश्न यह उठता है कि

इसे जानबूझकर या

जाने अनजाने रचना क्यों

रचना तो इसमें घुसना क्यों

प्रवेश पाना तो इसमें उलझना क्यों

कठिन रास्तों पर इसके फंसना क्यों

भीतर इसके आखिरी बिन्दु पर

पहुंचकर फिर

बाहर निकलने के लिए

मन में एक छटपटाहट क्यों

चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता

जो नहीं आता तो

इन रास्तों की तरफ चलने के लिए

पहला पग बढ़ाना क्यों

चक्रव्यूह तो चक्रव्यूह है

छोटा हो या बड़ा

एक उलझी हुई डोर है जिसे

उलझा लिया तो फिर

सुलझाना मुश्किल

खुद पर नियंत्रण रखें और

कैसा भी हो चक्रव्यूह उसमें

प्रवेश न करें और

कोई इस में धकेल दे तो

किसी की मदद लेकर या

खुद के ज्ञान और अनुभव से

जल्द से जल्द से इससे बाहर निकल

आयें और

चैन की सांस लें

राहत की एक मधुर बांसुरी बजायें।


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