गुस्सा आता तो है लेकिन


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सारी बातें ही

अक्सर एक खीझ सी पैदा करती हैं लेकिन

कोई करे क्या

किससे नाराज हो

अपना गुस्सा किस पर उतारे

सही का प्रतिशत कम है

गलत का प्रतिशत अधिक

गलतियां ही गलतियां पकड़ में आती हैं

जिधर नजर दौड़ाऊं लेकिन

कोई उन्हें सुधारे

यह किससे कहूं

जब अधिकतर लोग करते हैं

गलतियों पर गलतियां

गुस्सा आता तो कई बार बहुत है लेकिन

इसे फिर कहीं मन के कोने में

दबाना ही पड़ता है

इसे एक शीतल पानी समझकर

पी जाना पड़ता है

इसे अनदेखा करना पड़ता है

यह समझना पड़ता है कि

हालात अपने कुछ ऐसे हैं कि

नाराज होकर

सही बात कहने पर भी

कोई उसे सुनने वाला नहीं

समझने वाला नहीं

उसे महत्व देने वाला नहीं

उस पर अमल करने वाला

उस परिस्थिति में कहीं कोई सुधार

होने वाला नहीं

यह गुस्सा

कहीं फिर अपना ही खून जलायेगा

अपना ही चेहरा लाल पड़ेगा

बदसूरत लगेगा

लोगों को तो यह किसी हाल में

सुधार न पायेगा

वह जमाने तो गये जब

लोग सुन लेते थे

किसी बड़े को हक होता था

अपने से छोटो पर गुस्सा कर लेने का

लेकिन

आज तो नजर भरकर भी

देखा किसी की तरफ तो

इसके बदले में कुछ भयावह

कुछ अनिश्चित

यहां तक की मौत भी तोहफे में

मिल जाये तो

इसमें कोई बड़ी हैरानी की बात

नहीं।


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