दो नदियां


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एक नदी

पहाड़ों के अंचल में

जंगल के बीच से होकर

बहती है

दूसरी मेरे दिल के भीतर

मेरी शिराओं के मध्य से गुजरते हुए

दोनों ही बहती रहती हैं और

एक निश्चित समय पर मिल जाती हैं

सागर से

दोनों को अपनी मंजिल पता है

अपनी नियति की मालूमात है

कहानी की शुरुआत से ही उसका अंत

पता है लेकिन

जीवन को तो चलना होता है

एक नदी की तरह ही बहना होता है फिर

आता है जो पड़ाव आखिर में

उस पर हमेशा के लिए रुकना

होता है

इसके पश्चात उसका ही बनकर

सदा के लिए रहना होता है

बस इस नदी की तरह ही

सबके जीवन की कहानी है

उम्र भर मोड़ लेती रहती है

विस्तार को बढ़ाती रहती है फिर

हो जाती है संकुचित

सिमट जाती है ठहर जाती है

एक आखिरी मोड़ के बिंदु पर आकर पानी की एक बूंद

बनकर ही बस कहीं रह जाती है।


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