सपने: वर्षा सरन द्वारा रचित कविता


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सपनों की बारिश में , एक रात मैं भीग गयी।
फिर उन्हें पलकों में सजा कभी जगी कभी सो गयी।
उन्हें पाने की ख्वाहिश में दिन रात एक करती गयी।
और एक दिन मेहनत और लगन से उसे पा भी गयी।
फिर दूसरे सपने नें ली अँगड़ाई और मुझे राह नई दिखाई।
वो सतरंगी सी झिलमिलाती हुई पास मेरे आयी।
बोली गर जाएगी उस राह पर तो मिलेगी तुझे तारों की महफ़िल।
एक अंतहीन रेशमी उजाला होगा तेरे जीवन में उसने ये बात समझाई।
मैं बावली, फिर उसकी बातों में आयी और नए सपने के खातिर अपनी सारी जुगत लगाई।
फिर एक वक़्त ऐसा भी आया कि इसकी चाल मेरी समझ में आयी।
कि ये मायावी दुनिया बिन सपनों के जाल के अधूरी है।
आखिर जीने के लिए किसी ठोस वजह को  बुनना जरूरी है।
पर सपनें, इस मरूस्थलीय जीवन के सफर में  मृगतृष्णा हैं जो ललचाते ही जाते हैं।
एक मिले फिर दूसरा ये ही भ्रम फैलाते हैं।
और फिर भी पथिक प्यासे ही रह जाते हैं ।
अंततः जीवन सिर्फ शिव और शिवत्व का बंधन है।
सत्य ,शिव और सुंदर ही हमारे जीवन का वास्तविक ठोस अवलम्बन है।

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