पहली बारिश: सरिता खुल्लर द्वारा रचित कविता


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जलती तपती धरती पर पहली वर्षा के फुहार,
सोंधी ख़ुशबू ने छेड़ दिए मन के सुरीले तार,
मयूर सा नाच उठा जो अब तक था ग़म में डूबा ,
सुन कर बूँदों की रिमझिम सुरम्य झंकार,
अमराई में झूले लगे करने सखियों का इंतज़ार,
सावन मैं पीहर में होने लगा बिटिया का इंतज़ार,
कैसी चली आज यह  बलखाती इठलाती पवन,
भूल गए हम को तो गर्मी के सब जुल्मों सितम,
खिड़की पे टपटप बूँदों का संगीत लगा भाने,
आने लगे याद हम को वो गुज़रे ज़माने,
बारिश में भीगना ,छींटे उड़ाना, खीर पूड़े खाना,
बरखा के मौसम का हर एक मीठा तराना ,
यह है प्रकृति का एक अनूठा त्योहार,
जाग जाता है हर एक दिल मैं प्यार,
मयूर भी नाच उठा है बादलों के साथ,
प्यासी धरती की अब तो मिटी है प्यास।

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