आज़ाद परिंदे: ऋषिका श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता


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जहाँ नफ़रत हो दिलों में हम वहाँ पैर नहीं रखते….
आज़ाद परिंदे है हम एक जगह ठहर नहीं सकते..
अनगिनत बार परिस्थितिया प्रतिकूल नहीं रहती है हमारे लिए,,
पर उत्साह की अनमोल रत्न को कम नहीं कर सकते….
आज़ाद परिंदे है हम एक जगह ठहर नहीं सकते..!
जब तक साँसें चलती है हर आहट पे उम्मीद लगाए रखते है..
मजबूत है लोहे की दीवार की तरह हमारी भी हौसलें,,,
मन ही मन घबड़ाकर हमारा हक़ छोड़ नहीं सकते….
बिना किसी कसूर के उम्र क़ैद की सज़ा हम सह नहीं सकते….
आज़ाद परिंदें है हम एक जगह ठहर नहीं सकते..!
बागों में तितलियों सी सजके महकाना है हमें हर पोर-पोर,..
तिनका-तिनका जोड़ कर ही सही अपनी ख़्वाहिशों को कम नहीं कर सकते….
सुदृढ़ता से असंभव को भी संभव कर सकते है हम,,
हवा के बीच में ख़ुद को रोककर मंज़िल का दामन छोड़ नहीं सकते..
आज़ाद परिंदे है हम एक जगह ठहर नहीं सकते..!!
“हम हर विकसित जीव को जीवन जीना सिखाते है..
हम ही परिंदे जीवन का “अभि” सही मोल समझाते है..”

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