एक इमारत में
कमरे तो बहुत है लेकिन
हर कमरा
खुद में कहीं अकेला है
न कहीं जाता है
न किसी से मिलता है
उसकी प्रकृति ही ऐसी है कि
वह अपनी जगह से हिलता डुलता नहीं उसमें एक हद से ज्यादा कुछ करने की क्षमता भी नहीं
वह कमजोर है,
ताकतवर नहीं
उसे ऐसा लगने लगा है या
उसे लोगों द्वारा ऐसा महसूस करवाया जाता है लेकिन
वह अपनी हदों की पनाहों में जाकर बहुत खुश है
तन्हाइयां उसे रास आने लगी हैं
दुनिया की दगाबाजियों से तो
कम से कम लाख दर्जे बेहतर हैं।
0 Comments