एक पेड़ की टहनी
वह भी टूटी हुई
छितरी छितरी
कितनी पतली
कितनी बारीक
कितनी नाजुक
तुम दोनों चिडियायें
इस पर क्यों बैठ गई हो
अपने गर्दन मोड़कर
क्या देख रही हो
एक ही दिशा की तरफ तो
बेशक देख रही हो
एक दूसरे की तरफ भी नहीं देख
रही
दोनों किसी बात को
लेकर गंभीर भी हो
कुछ गहरा विचार विमर्श भी
मन ही मन कर रही हो
किसी शिकारी को
शायद देख लिया है तुमने
वह तुम पर कहीं आक्रमण न कर दे
इस बात से परेशान हो या
कोई आपस में झगड़ रहा है तो
भयभीत हो
इस दुनिया में
जन्म तो मिल जाता है लेकिन
जंगल में भी और
जंगल से बाहर
सब जगह हिंसा,
अत्याचार, क्रूरता, वैमनस्य,
जंगलराज आदि ही व्याप्त है
दो पल किसी को सुकून के नहीं
मिलते
आसमान में उड़ो तो
गिद्ध, चील, बाज आदि से
जान का खतरा
जिनका होता उनके क्षेत्र में वर्चस्व
जमीन पर उतरो तो
मनुष्यों की पशु प्रवृत्ति से
भय
किसी जंगल की हरियाली के
बीच छिपने की कोशिश करो तो
इसके जंगलीपन का खौफ लेकिन
जिंदगी मिली है तो
कुछ न कुछ करके
इसे गुजारना तो पड़ेगा
यह भी तो कुछ कम भाग्य
नहीं कि
इस पेड़ की चटकी हुई
टहनी पर
हम दोनों अकेली नहीं
एक दूसरे का कम से कम
हमें सहारा है।
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