यह सूरज की किरणें हैं या
रात में
झाड़ियों में टिमटिमाते जुगनू
यह दिन का समय है या
रात्रि का कोई प्रहर
यह समय का एक दरिये जैसा
बहाव ही तो है
जहां चाहो कोई बिंदु एक कील सा
गाड़ दो और
बांध लो उसे अपने आंचल में
ठहर जाये वह पल
पल दो पल के लिए
समय की बहती धाराओं को मोड़ लो उसकी सीमायें भी अपने अनुरूप निर्धारित कर लो
सूरज को चांद समझो
फूल को एक कांटा
प्रतिकूल परिस्थितियों को
अपने अनुरूप ढाल कर अनुकूल बना लो यह तो हर किसी के अपने हाथ में है ही
उसका इस पर अपना बस है
अपना नियंत्रण है।
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