जब मैं सुबह जागती हूं तो
दिल में एक बड़ा भारी कृतज्ञता का भाव होता है कि
जिंदगी का कल तक का सफर सही प्रकार से बीत गया और
आज की सुबह
यह प्रभु के कर कमलों से रचित सुंदर संसार देखने का
एक सुअवसर फिर से मुझे प्राप्त हो पा रहा है लेकिन
दिल में कल जो दर्द का दरिया बह रहा था
उसका प्रवाह आज भी जस का तस बना हुआ था
यह दर्द न जाने कम क्यों नहीं होता
यूं तो रात भर गहरी नींद में
उतरकर भरपूर विश्राम किया था मैंने
अपने तन, मन, आत्मा आदि को
जितना संभव था, आराम दिया मैंने
यह दर्द एक नश्तर की तरह क्या
मरते दम तक चुभेगा मुझे
क्या यह कभी रत्ती भर कम नहीं होगा
क्या यह उम्र भर एक कांटा बनकर
मुझे तकलीफ देता ही रहेगा
एक फूल बनकर मेरे गालों को कभी
नहीं सहलायेगा
मेरे होठों को कलियों की बहार बनकर कभी नहीं चूमेगा
मुझे बिना दर्द के अथाह सागर के
एक नई सुबह का उगता सूरज कभी नहीं दिखायेगा
मेरे मन का संभव होता कुछ भी तो नहीं दिख रहा लेकिन
क्या फिर मैं हार मान कर बैठ जाऊं
लड़ूं नहीं इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए
यह दर्द क्यों है
यह मुझे इतना क्यों सताता है
इसने मेरे दिल में घर क्यों कर लिया है
यह मुझसे जन्म जन्मांतर का रिश्ता क्यों बना रहा है
यह एक परछाई की तरह हाथ धोकर मेरे पीछे क्यों पड़ गया है
सवाल अनगिनत है लेकिन
मेरे पास फिलहाल कोई जवाब नहीं
सही समय आने पर शायद इस
जीवन से संबंधित समस्याओं के हल मिल जायें
शायद मेरे जीवन में कोई सुबह ऐसी भी हो कि
मुझे मेरे हर प्रश्न का उत्तर मिल जाये
मुझे हर दर्द से निजात मिल जाये और
जीने का कोई बेहतर सूरज की रोशनी से ही भरा विकल्प मिल जाये।
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