हर रंग फीके लग रहे हैं
चटकीले भी
यह मेरी आंखों का भ्रम नहीं है
जिंदगी भर का मिला तजुर्बा है
रेल की पटरी पर से गुजरती
सरपट दौड़ती रेलगाड़ी
आंखों में धूल ही झोंकती है
न ही उसे फुर्सत है पल भर के लिए अपनी गर्दन मोड़कर
मेरी तरफ देखने की भी
न ही वह पुकारने पर
मुझसे मिलने को दो पल भी
ठहरती है
हर किसी को जल्दी है
बहुत जल्दी
कोई मंजिल भी प्राप्त नहीं करनी है
जो सदियों से इंतजार में बैठे हैं राही उनके लेकिन
उनको कोई महत्व नहीं देना है
उनकी तरफ नजर भर न देखना है
न ही उन्हें गले लगाना है।
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