राज़


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राज़ तो जो

खुली आंखों से दिखते हैं

वह भी झूठे हो सकते हैं और

उससे भी अधिक गहरे और घिनौने हो सकते हैं

मानव के मस्तिष्क की सोच का कोई अंत नहीं होता

उसके बुने साजिश के जालों का

किसी को पता नहीं होता

किसी की मुस्कुराहट के पीछे

कितने जहर घुले हैं

इसका अंदाजा किसी

अमृत की धार सी समझ रखने वाले को नहीं

हो सकता

राज़ पर से पर्दे जो उठते हैं तो

वह तो परत दर परत फिर खुलते ही

जाते हैं

सामने जो सच और तथ्य निकलकर

आते हैं

वह किसी की कल्पना से परे होते हैं

कई बार अफसोस होता है कि

यह सब जो हुआ उसकी जरूरत ही क्या थी

लेकिन कुछ लोगों की प्रकृति ही ऐसी होती है कि

वह अमानवीय कृत्य करते ही हैं

जैसे किसी के प्यार में पड़ा कोई

मनुष्य खुद को प्यार करने से रोक नहीं पाता

ठीक वैसे ही किसी से नफरत करने वाला भी

खुद को साजिशों, झूठ, फरेब, अफवाहों आदि

के जाल बुनने से रोक नहीं पाता

उस पर पागलपन इस कदर सवार होता है कि

उसके राज़ कभी न कभी

सबके समक्ष उजागर हो ही जायेंगे

इसका भी उसे भय नहीं सताता।


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