सुबह उठकर
जब मैं देखती हूं
सूरज की तरफ तो
सोचती हूं कि
मैं तो रात की बाहों में
अपना सिर रखकर
एक गहरी सपनों की नींद में सोई हुई
एक चांदनी थी या
शायद एक चांद थी
कभी पूरा, कभी अधूरा सा
अब सुबह आंख खुलने पर
आसमान में उगता सूरज कैसे हो गई
कल रात तो मैं एक बर्फ की तरह ठंडी और शीतल थी
यह सुबह आंख खुलते ही एक
आग का धधकता गोला और एक अंगारे सी इतनी गर्म कैसे हो गई।
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