सांझ के सूरज के संग
मैं ढल रही हूं
सुबह के सूरज के साथ
मैं उग रही हूं
रात के चांद के साथ
रात भर करती हूं बातें
सो जाती हूं रात्रि के आकाश के
तकिये पर सिर अपना रखकर
तारों की छांव में
ठंडी हवायें सरसराती सी चलती
कभी मुझे लोरी गाकर सुलाती हैं
कभी अपने हाथों से पंखा झलती हैं यह सारी कायनात चूमती है
मेरे माथे को
मां-बाप का दुलार देती है
यह मानव जाति से कई मायने में
बेहतर प्रकृति है
जब मैं चाहूं मुझे अपना भरपूर सानिध्य देती है।
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