हर किसी को
आज की भागदौड़ की जिंदगी में
शांति की तलाश है लेकिन
यह शांति मिलती कहां है
किसी के घर जाकर
किसी से मिलकर
कहीं घूमकर
कुछ खरीद कर
कुछ खाकर, पीकर, पहनकर
कुछ देखकर
कुछ सुनकर
आदमी यह खुद नहीं जानता कि
वह चाहता क्या है
कभी खेलता है
कभी टहलता है
कभी कोई भजन गाता है
कुछ पूजा पाठ करता है
कभी योग करता है
कभी ध्यान की मुद्रा में
बैठता है
कभी कुछ पढ़ता है
लिखता है
कहीं पहाड़ियों की
वादियों में भटकता है
कभी भीड़ के बीच तन्हा
महसूस करता है
एक उलझन के जाल में फंसा
रहता है
जितना सोचता है
उतना भांति-भांति के विचारों के दलदल में
फंसता है
शांति को ढूंढता फिरता है लेकिन
वह नहीं मिलती
ऐसा लगता है जैसे
वह भी कहीं खो गई है
दुनिया के शोर में
कहीं दब गई है
गहरी मिट्टी के नीचे
कहीं गुम हो गई है
आकाश के वायु के कणों के
साथ
शांति को पाने का
एकमात्र उपाय है
इसे खुद में ही कहीं खोज लेना
खुद को खुश रखने का
प्रयास
संतुष्ट रखने की चेष्टा
करना
संभवतः इस दिशा में
पहला कदम है
अपने हमसफर खुद बने
अपने से बाहर इसे कहीं
तलाशा तो
यह नहीं मिलेगी क्योंकि
यह किसी के भीतर निहित है
बाहर नहीं।
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