यह बंधन भी
एक कुछ अजीब
घुटन सी देने वाली
कोई चीज होती है
यह रिश्तों के जाल को काटकर
हर कोई इनसे एक धुएं के गुबार की तरह
आजाद होना चाहता है पर
दिल पर हाथ रखकर
बिल्कुल सच कहना कि
क्या हो पाता है
एक परिंदे के पंख काट दो लेकिन उसकी आंखों से
आसमान में उड़ान भरने का सपना कोई छीन नहीं सकता
दरअसल मनुष्य को यह पता ही नहीं चलता तमाम उम्र कि वह चाहता क्या है
एक विचित्र प्राणी है
खुद को उलझाता भी रहता है
खुद ही और
खुद ही अपनी उलझनों को सुलझाना भी चाहता है।
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