यह रहस्यों का खेल


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मैं तुम्हारा रहस्य जानने का तो

हमेशा इच्छुक रहता हूं लेकिन

क्या कभी खुद को समझ पाने की चेष्टा की है

मैं दूसरों के रहस्यों का जानकार होने के दावे

अक्सर ठोकता हूं

यह एक इंसानी फितरत है जो

सच में बहुत ही अजीबोगरीब है

सारी उम्र इस दुनिया के लोगों की परछाइयों के पीछे भागते रहो और

तब तक भागते रहो जब तक अपना साया

खुद के सांसों के दरिया से एक डूबती हुई

छोटी कागज की नौका वह भी फटी हुई सा

न फिसल जाये

मैं फिर लौट आती हूं चलो

एक दरिया में तैर कर

उसके पार आकर

किनारे पर लगकर

उसकी रेतीली मिट्टी पर छोटी-छोटी उगी दूब पर

अपने नंगे पैरों से चलती

कुछ सोचती हुई कि

दरिया की जल तरंगों की

सतह पर तैर कर जो अभी-अभी

लौटी हूं तो उसके भीतर की

गहराइयों में दबे रहस्यों को कितना

जान पाई मैं

जान भी लेती तो क्या सारी उम्र

उसके साथ ही गुजारनी थी

लौटकर तो आना था फिर मुझे

उसके किनारों पर ही

किनारों पर से अपने नजारों

अपने इशारों और

अपनी हदों तक ही अंततः सिमटना था

मैं बहुत बारीकी से तो नहीं पर हां

मोटे तौर पर तो जान सकती हूं

हर किसी के रहस्यों को

जो भी विद्यमान हैं इस कायनात में लेकिन

फिर मन में वही एक सवाल उठता है कि 

यह दुनिया भर के रहस्यों को मैंने जान भी लिया गर तो इनसे आखिर में

मुझे क्या हासिल हुआ

मुझे किसी भी तरह का कोई फायदा हुआ मसलन कोई इस दुनिया से

जुड़ा अनुभव ही प्राप्त हुआ हो

होता भी होगा थोड़ा बहुत कुछ प्राप्त लेकिन

समय के साथ सब कुछ क्षीण,

कमजोर और बंद होती आंखों से ओझल

होता चला जाता है

आखिरकार किसी के हाथ कुछ नहीं लगता है

हर किसी की चालाकी, होशियारी, समझदारी

सब कुछ उसके सिरहाने धरी की धरी ही रह जाती है

न किसी अन्य के रहस्य, न अपने रहस्य, न इस मायावी दुनिया के रहस्य

अंत में

जीवन के आखिरी मोड़ पर

एक आखिरी सांस भरते

यह रहस्यों का कोई भी खेल काम नहीं

आता है।


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