आसमान की छत से
टपक रही जो
ओस की बूंदें
एक पत्ते की चिकनी देह पर तो
संभल नहीं पा रही
ठहर नहीं पा रही
स्थिर नहीं हो पा रही
पत्ते की प्रेम भरी पुकार को सुन नहीं पा रही
उसकी मनुहार को जैसे हों ठुकरा रही उसके आगोश में समा नहीं पा रही
यह मिलन तो था बस पल दो पल का यह न था बरसों का
सदियों का
जन्म-जन्मांतर का
एक लंबे समय तक नहीं किसी रुके हुए पानी सा
यह तो था नदी की एक बहती धारा सा आते ही विदा लेकर जाता हुआ और
वह भी हमेशा के लिए
फिर कभी मिलना संभव न हो पायेगा यह रोता हुआ
आंसू बरसाता
बेबस सा पत्ता
चाहे तो अपनी उम्र पूरी होने तक
टकटकी लगाये
इन चली गई ओस की बूंदों का
इंतजार भले ही पूर्ण समर्पण भाव से क्यों न करता रहे।
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