यह पेड़ न जाने कैसा है


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यह पेड़
न जाने कैसा है
न सूखता है
न जड़ से इसका अस्तित्व
खत्म होता है
न यह आकार में विकसित
होता है
न यह जमीन के भीतर
अपनी जड़ें फैलाता है
न यह आकाश की
ऊंचाइयों को छूने का प्रयत्न
करता है
न इस पर बहार आती है
न इस पर कोई फूल खिलता है
न यह पतझड़ में
मुरझाता है
न यह मौसम के रंगों को
देखकर मुस्कुराता है
न यह बारिश के पानी में
नहाता है
न यह किसी तालाब के
जल के दर्पण में
अपना चेहरा देखकर
खिलखिलाता है
न इसकी टहनियों पर
किसी पंछी का बसेरा है
न इसकी शाखों को छूता
उम्मीदों का कोई सवेरा है
कुछ न होते हुए भी
यह जिद्दी इस कदर है कि
जिंदा रहना चाहता है
जिंदगी से हार मानने को यह
तैयार नहीं
मौत इसके दरवाजे पर खड़ी है लेकिन
यह है कि मरने को तैयार नहीं।


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