पलों का फिसलना तो
बदस्तूर जारी होता है
यह कभी कहां ठहरते हैं
एक तितली किसी फूल पर
एक बार को तो भी बैठ जाती है
कुछ पल के लिए और
चुपके से उसके पास जाने पर
पकड़ में भी आ जाती है लेकिन
यह पल
यह पलों की श्रृंखला
यह समय तो
एक रेत की धार सा ही
बंद मुट्ठी से फिसलता चला
जाता है
किसी की पकड़ में
काबू में
कैद में कभी नहीं आता है।
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