यह दो चेहरों का
एक रावण है जो
हर समय युद्ध भी करता रहता है और
बीच-बीच में आवश्यकता पड़ने पर
थोड़ी बहुत सहानुभूति भी दिखा देता है
बैर अधिक हो
प्यार कम हो या
न के बराबर हो तो
ऐसी स्थिति में थोड़ी बहुत देखभाल
करने का भी क्या औचित्य रह जाता है
दो दिलों के बीच की दूरियों की खाई को जो
गहरा करने का निरंतर प्रयास किया तो
फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा कि
कोई भी यत्न उसे पाट पाने में
असफल साबित होगा
युद्ध किसी भी तरह का
किसी भी स्तर का
किसी के भी दरमियान हो और
एक लंबे समय तक जारी रहे
समय रहते न उस पर कोई अंकुश या
विराम लगे तो उसके नतीजे
भयावह होंगे
जो उसके प्रभावों को अपने ऊपर झेलेगा
वो फिर कैसे आसानी से
चोट पहुंचाने वाले को माफ कर देगा
दिल में विष भरा हो लेकिन
समाज में अपनी एक साफ सुथरी छवि
बनाने के लिए हमदर्दी का झूठा दिखावा,
ढोंग, आडंबर . . . लेकिन
यह सब नाटक कब तक कोई बर्दाश्त करेगा
सहानुभूति के एक सफेद झूठ का कभी न
कभी तो पर्दाफाश होना चाहिए
युद्ध भी कहीं स्थाई रूप से रुकना चाहिए
इस भ्रम पैदा करती कहानी का कहीं अंत होना
चाहिए
इस नौटंकी की समाप्ति होनी चाहिए
पर्दा गिरना चाहिए
रावण का असली चेहरा दर्शकों के सामने
आना चाहिए
रावण के वास्तविक रूप को
पहचान कर
सबको अपनी-अपनी कुर्सियों पर से
उठकर अपने घरों की तरफ प्रस्थान
कर लेना चाहिए
जो पात्र रावण के आतंक से
थे आतंकित
उन्हें इसका साथ हमेशा के लिए
छोड़ देना चाहिए
इसका त्याग कर अपने जीवन का कोई
नया मार्ग चुनना चाहिए
यह रावण जिंदा रहे या फिर मरे
इस दुविधा में भी नहीं पड़ना चाहिए।
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