यह दुनिया एक कोयल के घोंसले सी


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जब तक मेरा अस्तित्व है
यह दुनिया मेरी है
जिस पल मैं नहीं
न यह जिस्म,
न यह दिल,
न यह रूह,
न यह जिंदगी,
न ही फिर यह दुनिया मेरी है
मैं भी हूं एक कोयल सी ही
जिसके गर्भ में पल रहा
बच्चा उसका है लेकिन
उसका कहने को कोई अपना घर नहीं उसके बच्चे का जन्म होता है
किसी अन्य पक्षी के घोंसले में
उसे पालता है कोई और
उसे लोरी गाकर सुनाता है
कोई और
यह जग
इसकी हर वस्तु सुंदर और
अपनी लगती है
जिस दिन टूटेगी तेरी
सांसों की डोर
उस दिन हर आस लगेगी
झूठी और
यह दुनिया तुझे प्रतीत होगी
एक कोयल के घोंसले सी ही
विचित्र
एक पागलखाना
तेरे जैसे एक सामान्य
व्यक्ति को भी।


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