एक फूल सी खिल जाऊं
एक जलतरंग सी बज जाऊं
फूल जो मुरझा जाये तो महक रह
जाये
जलतरंग का साज जो टूट जाये तो
संगीत के स्वर का कंपन रह जाये
यह जमीं जो छूट जाये तो
आसमां रह जाये
यह जिस्म जो छूट जाये तो
रूह का अस्तित्व कहीं अंश
मात्र रह जाये
यह आवाज का दर्पण जो टूट
जाये तो
खामोशी का लिबास किसी दीवार
पर टंगा रह जाये
यह रूप रंग जो उड़ जाये तो
मेरे तुम्हारे नाम का कोई
किरदार रह जाये
यह जीवन के पोखर का
जल जो ठहर जाये तो
उसके एक आखिरी भंवर
की परछाई का नृत्य करता दृश्य कुछ देर तक
उस जलाशय में खिले
किसी कंवल के हृदय स्थल की पंखुड़ी में एक तितली सा
ठहर जाये।
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