आहिस्ता आहिस्ता
टुकड़ों में खत्म होती है जिंदगी
पूरी कहां
अधूरी सी ही जीने को मिलती है यह जिंदगी
बर्फ की डली सी यह जिंदगी
सर्द मौसम के गुजरते ही
पिघलकर पानी में तब्दील हो जायेगी सूरज की गर्मी से फिर भाप बनकर भी कहीं उड़ जायेगी
कितनी भी कोई कोशिश कर ले लेकिन हाथ किसी के नहीं आयेगी
पल पल रूप बदलती रहती है
यह तो
हर दफा जो होती है एक नये
लिबास में तो
किसी की पहचान में कहां आती है
फूल सी खिलती है फिर
पत्ता पत्ता झड़ती है
इस कहानी का अंत बस यही है कि जिसको जितनी मिली
उतनी भी हर किसी को नहीं
मिलती है
इससे क्या करना गिला शिकवा
यह जैसी है, जितनी है
ऐसी है कि वैसी है
ठीक है
सब ठीक है।
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