यह कांच की आंखें


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आंख है पर
आंख पर
पढ़ने के लिए
पढ़ने वाला चश्मा जो न लगाया तो
कुछ भी पढ़ने में नहीं आयेगा
समय के साथ
यह बेजान वस्तुएं भी
कितनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं
लोगों की जिंदगी में
कुछ साथ रहे या न रहे
घर से बाहर निकलते वक्त
कहीं यह चश्मा पीछे छूट गया तो
आधा रास्ता तय करने पर
याद आने पर
घर वापस लौटकर
इसे साथ लेना होगा
अपनी आंखें जब बढ़ती उम्र के साथ
दगा देने लगती हैं तो
यह कांच की आंखें
हर धुंधली चीज को
स्पष्ट रूप से दिखाने का बीड़ा उठाती हैं
कुछ भी न दिखता
कुछ भी पढ़ने में न आता
सुई में धागा भी न पिरोया जाता
दाल चावल भी न बीना जाता
कोई भी बारीक काम
सफाई से न हो पाता जो
यह पढ़ने के चश्मे का आविष्कार
न होता
भला हो उस भले मानस का
जिसने यह चश्मा बनाया और
बढ़ती उम्र के साथ
आंखों पर पड़ते बोझ को
सौ फीसदी कम करवाया।


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