यह उत्सव कैसा


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न अपनाहट
न परायापन
इस तरह के व्यवहार को तो
कहा जायेगा
महज एक कोरापन
अपने पर से ध्यान हटता ही नहीं
अपने सिवाय इस भरी पूरी दुनिया में
कोई दूसरा जचता ही नहीं
बेहद खुदगर्ज
दर्पण में देखने पर भी
बस अपना अक्स दिखे
आजू-बाजू जो भीड़ खड़ी
उनमें से भी किसी का चेहरा दिखता नहीं
यह सब कहां अदृश्य हो गये
क्या इन सबका मोल यही बेरुखी है
यह उत्सव कैसा जिसमें
अधर्म की सारी पराकाष्ठाएं पार हो जायें
एक अनहोनी घटना फिर यह घटी कि
जिस दर्पण में यह अधर्मी झांक
रहे थे
वह शर्मिंदा होकर बिना कारण
चटक गया और
उस जगह एक कालिख पोतता ग्रहण लग
गया
एक भयावह अंधेरा हमेशा के लिए
उन लोगों के दिलों में
जिन्हें बुरी तरह दुत्कार गया था
हमेशा के लिए व्याप्त हो गया।


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