मैं तो एक कुआं हूं
जो बारिश हो या न हो
जल की बेशुमार बूंदों से भरा ही रहता है सिर से पांव तक लबालब
जितना चाहो अपनी प्यास
बुझा लो मेरे जल से
ओ मेरे समीप से निकलते
राहगीरों
यह कभी खाली नहीं होगा
इसका गला रहता है हमेशा तर
कभी प्यास से व्याकुल नहीं होता
मेरा जल भी पीने योग्य है
शीतल है
अति उत्तम है
तुम अपनी गागर में
मेरा जल ही नहीं
मेरा संपूर्ण जीवन भर लो
मेरा पूरा उपयोग कर लो
मुझ पर तुम्हारा अधिकार है
तुम्हारे इस कृत्य पर मुझे कोई आपत्ति नहीं
मैं इस कृपा के लिए धन्य हुई
मैं करती तुम्हारा धन्यवाद बारंबार
ऐ मुझको छूकर हवाओं से
गुजरते हुए तुम सब
मेरे सिपहसालार।
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