वक्त की शाख से
टूटता हुआ एक लम्हा हूं
पलकों की चिलमन पर बैठकर भी
जो फिसल गया वह सपना हूं
मैं तन्हा हूं।
मुझे यह जिंदगी मिली पर
क्या सच में जीने के लिए मिली
बंद आंखों में ख्वाब सजते नहीं
खुली आंखों से देखने की कोशिश में हूं
मैं तन्हा हूं।
दुनिया की भीड़ में मैं शामिल हूं पर
यह भीड़ मुझमें नहीं
मैं दरख्त से गिरे पत्ते अपनी झोली में खूब समेटती हूं क्योंकि
मैं तन्हा हूं।
हर पतंग
आकाश में उड़ती
मेरी ही छत पर कट कर क्यों गिरती है इसे भी क्या यह लगता है कि
मैं तन्हा हूं।
आकाश भी तन्हा है
यह जमीन भी तन्हा
आकाश में उड़ता पंछी अकेला है
इस जमीन पर मैं और मेरा दिल
मैं तन्हा हूं।
काश टूट कर बिखर जायें
मेरे पांव में बेड़ियों से बंधे घुंघरू
इनकी खनक मुझे रास नहीं आती
बेसुरे हैं यह जो कहते हैं मुझसे कि
मैं तन्हा हूं।
मैं एक नदी हूं पर ठहरी हुई
मैं एक फूल हूं पर कुचला हुआ
मैं एक सपना हूं पर सोया हुआ
मैं पूर्ण हूं पर अपूर्णता लिए
मैं तन्हा हूं।
मैं जिंदगी से जिंदगी मांगती हूं
मौत नहीं
मैं दर्पण से खुद का
साथ मांगती हूं
मैं इंसान हूं कोई खुदा नहीं
मैं तन्हा हूं।
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