मैं जो कलाकृति बनाना चाहती थी


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जमीन पर रंग रखे और बिखरे हुए दिख रहे हैं तुम्हें
कैनवास पर जो पेंटिंग या स्केच या कोई कलाकृति आदि
मैं बनाऊंगी
वह भी दिखेगी तुम्हें लेकिन
मेरे मन के आकाश पर बादलों से
उमड़ते घुमड़ते भावनाओं की एक विस्तृत दुनिया के सैलाब को
तुम या कोई अन्य नहीं समझ पायेगा
जो मन के भीतर है
उसका एक बहुत छोटा स्वरूप ही
थोड़ा बहुत बाहर निकलकर झांक पाता है
मैं कहना कुछ और चाहती थी किंतु
कुछ और ही कह गई और
तुमने उसे कुछ अन्यथा लिया और
मैं जो थी
वह मैं न रही
मेरे जीवन की संपूर्ण कहानी ही बदल गई मैं जो कलाकृति बनाना चाहती थी
वह तो शत प्रतिशत नहीं बनी
कभी शायद यह संभव भी न हो सके लेकिन मैं संतुष्ट हूं
अपने सार्थक प्रयासों से
किसी को खुश करने की मैंने कोई जिम्मेदारी भी नहीं उठा रखी है
अपने सिर पर
मैं तो एक आजाद पंछी हूं
जी में आयेगा तो अपने पंख
फैलाकर एक खुले आसमान में
उड़ूंगी और
जब तक चाहूंगी उड़ूंगी
मेरे मन में आयेगा तो अपने
पंख सिकोड़कर अपने घर के किसी एकांत कोने में बैठूंगी
दिल करेगा तो कला के रंग
सर्वत्र और सर्वदा बिखेरूंगी अन्यथा
श्वेत श्याम चित्रों को ही
मन के पटल पर रेखांकित
करती रहूंगी।


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