मैं खुद से अजनबी हूं यहां


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कोई अजनबी नहीं यहां

एक मैं ही खुद से अजनबी हूं यहां

राह चलते

किसी नये मुसाफिर से मिलने पर

उसकी न पिछली

न ही अगली कहानी के बारे में

कुछ पता होता है तो

मन इधर उधर न भटक कर

उसके जीवन संबंधित घटनाओं का

कोई आकलन न करके

बस उस पर ध्यान केंद्रित

करता है तो

वह इंसान एक दोस्त सा ही

कोई अपना सा ही प्रतीत होता है 

परायापन कहीं नहीं होता

किसी को भी सही प्रकार से

जानोगे

उसे समझने की कोशिश करोगे तो 

अधिकतर अच्छा ही पाओगे

खुद की छवि देखो

दर्पण में तो दर्पण अक्सर

टूट जाता है

मैंने खुद को ही कभी कहां

पहचाना जो

दूसरों को जानने की मैं चेष्टा

करूं

कहीं कोई अजनबी नहीं लेकिन

खुद को कभी न जान पाना

अवश्य अजीब है और

खुद के साथ एक अजनबी सा

व्यवहार करने जैसा है।


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