मैं एक मोरनी सी


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मेरा नया घाघरा, चोली और
चुनर हैं ही इतने सुंदर,
मनमोहक और रंगीन कि
मैं एक मोरनी सी
अपनी खुशियों के पंख फैलाकर
अवसर चाहे कोई हो या न हो
सावन में बादल बरसते हों या
रेगिस्तान की तरह पड़ा हो हर तरफ
सूखा
कोई मेरी तरफ देख आहें भरता हो या
न हो
मैं नाचूंगी तो आज अवश्य ही
अपने बिखरे केशों को बांधकर
उसमें गजरा भी सजाऊंगी
मैं किसी को आज नहीं रिझाऊंगी
मैं अपनी खुशी की डोर को
अपने मन के वृक्ष पर ही
बांधूगी
मेरे संग तो आज नृत्य कर रहे
मेरे साथ खड़े कुछ हरे भरे पेड़
पौधे भी
मेरे संग थिरक रहे हैं ऐसे
जैसे कर रहे जुगलबंदी सी।


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