मैं आनंद के बगीचे में
रहना चाहती हूं पर
लाख कोशिश करने पर भी
रह नहीं पाती
एक दर्द की आंधी है जो
हर समय चलती रहती है
बिना रुके
मैं दिल के कमरे की खिड़कियां,
दरवाजे आदि चाहे कितने भी कसकर बंद रखूं
यह भीतर प्रवेश कर ही जाती है
मैं जो फूल पत्तियों के गुलदस्ते और गमले सजाकर रखती हूं
उन सबको तहस-नहस कर जाती है
इसे जरा सा भी रहम नहीं आता मुझ अभागी पर
इस दर्द की आंधी की दिशा
मुझे मोड़नी होगी लेकिन
कैसे तो
उसकी कोई युक्ति भी मुझे सोचनी होगी जब इसके शिकंजे से हो जाऊंगी मैं
मुक्त
तब सज पायेंगे, खिल पायेंगे,
महक पायेंगे मेरे आनंद के,
हुलास के, आमोद प्रमोद के बगीचे
स्थाई तौर पर एक लंबे समय के लिए।
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