मेरे शहर का हेड पोस्ट ऑफिस


0

मुझे अपने शहर का
हेड पोस्ट ऑफिस
बहुत अच्छा लगता है
इसके साथ जुड़ी यादें अनगिनत हैं
इसके एक तरफ यहां का सबसे पुराना पिक्चर हॉल 'तस्वीर महल'
जिसमें मैंने बहुत पहले देखी थी
'पाकीजा'
फिर कुछ बरस पहले 'लगान'
मैं इसे प्यार से कबूतर खाना
कहती थी
हो सकता है कभी देख लिया
होगा कबूतरों को कहीं
इधर-उधर बैठे या
बिल्डिंग के
अंदर ही कहीं उड़ते हुए
युवक युवतियों के
जोड़े भी तो कबूतरों के जोड़ों से ही अक्सर ऐसी जगह दिख जाते हैं
डाकघर के दूसरी तरफ
टेलीफोन एक्सचेंज
उसके पास एक मशहूर
छोले कुलचे का विक्रेता
लंच टाइम में एक अच्छी खासी खरीददारों की भीड़ से घिरा हुआ डाकघर के पास ही चाय वाला,
समोसे वाला, मिठाई वाला आदि
शहर का सबसे बड़ा पार्क भी
एक चर्च भी
एक सदियों पुरानी झील भी
गन्ने का रस बेचने वाला भी
अमरूद, आम, जामुन आदि
ऐसे मौसमी फल भी
चाट का भंडार भी
एक से बढ़कर एक दर्जी भी यानी
कुल मिलाकर पोस्ट ऑफिस
जाने से वहां से डाक बटोरने
या लेटर पोस्ट करने या
वहां का कोई अन्य काम करने के अलावा
और भी बहुत कुछ उपलब्ध
होता था करने को
हमारा पोस्ट बॉक्स नंबर
होता था 6
उसमें से दूसरे तीसरे दिन
जाकर निकालकर लाते थे
हम सब थैले में भरकर
ढेर सारी पोस्ट
हम बच्चों को लिफाफों पर
चिपकी हुई डाक टिकटें भी
बहुत लुभाती थी
ध्यान रखते थे इस बात का
हम कि कब हमारे पापा
उन लिफाफों को खोलें,
कूड़ेदान में खाली लिफाफों को
फेंके और
हम बच्चे तत्काल प्रभाव से
उन्हें उठाकर उस पर लगी
डाक टिकटें छुटायें और
उन्हें अपनी डायरी में
संग्रहित करें
डाकघर का माहौल बड़ा
कूल कूल होता है
एकदम से टेंशन फ्री
कभी कोई वहां एक चक्कर लगा कर आये
फिर कहे कि मैंने जो कहा
वह कितना सच कहा।


Like it? Share with your friends!

0

0 Comments

Choose A Format
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals