मेरा साया ही मेरा हमसफर है


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हमसफर तो 

कोई नहीं मिला 

इस जीवन के सफर में लेकिन 

दर्पण में झांकती अपनी तस्वीर और 

पानी में पड़ती अपनी परछाई को देखकर 

लगता है मुझे कि 

कोई और नहीं बल्कि

मेरा साया ही मेरा हमसफर है 

इस जीवन में 

इसे मैं खुद से ज्यादा अच्छे से

जानती हूं 

दगा नहीं देगा 

बेवफाई नहीं करेगा 

बस एक मोहब्बत का फूल ही

मेरे हाथ में देगा 

इतना तो जानती हूं 

दिल इसका साफ है एक दर्पण सा 

चेहरा इसका खिला है एक गुलाब के 

फूल सा 

काया इसकी दमकती है एक चमकते 

शीशे सी

आत्मा है इसकी पावन एक 

चंदन बन सी 

मन है इसका वृंदावन एक 

भगवान श्री कृष्ण की जन्मस्थली सा 

मेरे प्रेम का वास तो 

मेरे घर का द्वार ही है

इसकी चौखट पार करने का 

न मेरे में साहस है 

मेरे घर की दीवारों पर पड़ती 

परछाइयां ही हैं मेरी सखियां 

मेरी गोपियां 

मेरी तृष्णा 

यहीं हैं मेरी वह सच्ची हमसफर 

जिनके साथ रचाती मैं 

जीवन की 

अपनी प्रेम से भरी रास लीला।


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