मेरा मन काव्यात्मक है तो


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एक सप्ताह में सात दिन होते हैं
सप्ताह का पहला दिन सोमवार होता है और
सातवां या आखिरी रविवार
मेरे लिए हर दिन एक सा ही होता है
यह मुझ पर निर्भर करता है कि
मैं किसी भी दिन डटकर काम करूं या आराम करूं या
काम अधिक और आराम कम या
काम कम और आराम अधिक
यह संयोजन मेरी शारीरिक क्षमता, मानसिक स्थिति, आंतरिक और बाह्य कारकों आदि
पर भी आश्रित होता है
मेरा मन काव्यात्मक है तो
बिना कविता लिखे या पढ़े मैं नहीं रह सकती
घर के दैनिक कार्य तो करने ही पड़ते हैं उम्र बढ़ती है तो दर्द जिस्म की किसी भी शाख पर अपना घोंसला बनाकर
उसमें एक जिद्दी पक्षी की तरह रहना शुरू कर देता है
उड़ता भी नहीं
उसे उड़ाने की कोशिश भी करती रहनी पड़ती है
घर पर कोई मेहमान चला आये तो
उसे भी समय देना पड़ता है
सोशल मीडिया, न्यूज देखना, गीत संगीत सुनना, थोड़े बहुत अपनी फैक्ट्री व ऑफिस के काम देखने, बाजार के काम, फोन पर बातचीत, मैसजेस के जवाब देना आदि
लिस्ट तो बहुत लंबी है
यह जीवन खत्म हो जाता है लेकिन
काम कभी खत्म नहीं होते
रविवार को काम हो तब भी
लगता है कि यह छुट्टी का दिन है
पैर पसारकर आराम करने का दिन है जबकि कभी ऐसा होता नहीं है
रविवार के दिन काम सबसे ज्यादा होता है
सोमवार को सप्ताह का पहला दिन होता है
तो पूरे हफ्ते क्या करना है
यह तैयारी तो दिमाग में चलती ही रहती है
टारगेट तो कभी अचीव नहीं होते
लेकिन चलो
थोड़ा बहुत सही
सप्ताह के पहले दिन से
प्लान करने से
उसके आखिरी दिन तक
कुछ काम तो पूरे हो ही
जाते हैं
चाहे अधूरी सी शक्ल
लिए होते हैं।


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