मन में कभी डर उपजे तो


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मैं तन्हा हूं तो
क्या मुझे अपने अकेलेपन को लेकर
हर समय चिंतित रहना चाहिए
मैं बेरोजगार हूं तो
क्या मुझे अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर हीन भावना से ग्रसित हो जाना चाहिए
मैं अविवाहित हूं तो
क्या एक अकेली मैं ही
इस दुनिया की भीड़ में मेरा
जैसा कोई दूसरा नहीं
मेरे मां बाप की मृत्यु हो चुकी है
यह एक त्रासदी है लेकिन
इससे कोई कहां बचा है
मैं बीमार हो गई तो
मेरी देखभाल कौन करेगा
अब तक भी तो जीवन चला ही है
ऐसे ही प्रभु कृपा से
आगे भी चलेगा
मैंने एक लंबी उम्र नहीं पाई तो
मृत्यु तो सबकी निश्चित है
जब जन्म लिया है तो
घर में रात को मैं
अकेली होती हूं
कोई चोर बदमाश
घर में घुसकर मार गया तो
रास्ते में मैं कहीं गिर पड़ी तो
कौन मुझे उठाकर डॉक्टर के
पास मरहम पट्टी करवाने ले जायेगा
मैं किसी दुर्घटना की शिकार
हो गई तो
मुझे कौन अस्पताल पहुंचायेगा
मैं कहीं अपाहिज हो गई तो
मेरी देखभाल कौन करेगा
डर तो ऐसे अनेक कारणों से
उपजते हैं
जब जो होगा
तब की तब देखेंगे
किसी विषम परिस्थिति से निपटने
की तैयारी सही अवस्था में
जब हो तब से शुरू कर देनी चाहिए थोड़ा सा साथ लोगों का,
समाज का, सरकारी सुख सुविधाओं का, सामाजिक व्यवस्थाओं का, विभिन्न प्रकार की प्रणालियों का भी चाहिए
इस जीवन रूपी समुन्दर का
बेड़ा पार हो ही जायेगा
डरते रहने से कुछ हाथ नहीं
आता
सामने खड़ी चुनौतियों को स्वीकार कर जीवन में आगे बढ़ने की
हिम्मत जुटानी ही पड़ती है
मन में कभी डर उपजे तो
तत्काल प्रभाव से उसका
कारण ढूंढ स्वयं ही उसका
निवारण करें या
किसी अनुभवी व्यक्ति या विशेषज्ञ से
उस संदर्भ में आवश्यक
रूप से परामर्श लें लेकिन
डर को लेकर न बैठे रहे
यह जैसे आये उसे वैसे ही
जल्द से जल्द विदा करें और
पूरे मनोयोग, समर्पण भाव
और ध्यानपूर्वक अपने
काम में जुटें।


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