मन का उद्यान खिल उठे मरुद्यान की तरह


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जीवन

एक सोया हुआ नहीं अपितु

एक जीता जागता

सांस लेता हुआ

रेत उड़ाता

आंखों में धूल झोंकता

मन में हजार दुविधायें उत्पन्न करता

जेहन में असंख्य रेत के महीन कणों से ही

सवाल उपजाता

मंजिल पर कहीं न पहुंचाता

दिल की डगर को यहां से वहां

भटकाता

एक रेगिस्तान है

कहीं कोई सपनों की एक

सुंदर मंजिल लिए

डगर नहीं मिलती

दिल चाहता है कि

चलते चलते

कहीं कोई एक रमणीय स्थल

एक सुखदायक जगह

एक सुखद अंतराल

मरुद्यान की तरह

मिले

जहां कुछ पल ठहरकर

मन का उद्यान खिल

उठे एक फूलों के गुलशन और

सरसब्ज बाग की तरह ही।


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