मन का आकाश


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मन का आकाश
शांत था
तन के धरातल पर लेकिन
हलचल थी
इस विरोधाभास का द्वंद मेरे भीतर
कहीं चल रहा था लेकिन
दुनिया की आंखों को
इसका आभास तनिक भी नहीं हो
रहा था
वैसे देखा जाये तो
ऐसा कौन सा वृतांत होगा जहां
यह दुनिया वाले बिना कारण
हस्तक्षेप न करें
भेद सारे जानना चाहते हैं लेकिन
मदद करने के नाम पर
सब मुंह मोड़ लेते हैं
कोई आगे बढ़कर नहीं आता
अपना सहयोग करने का
कोई मन नहीं बनाता
इन कड़वी सच्चाइयों को यह
चेतन मन भली भांति जान
चुका है
इसी कारण अब यह हताश है
हारा हुआ है
उत्साहित सा नहीं दिखता है
मन का आकाश अब
हमेशा के लिए शांत हो चला है
स्थिर हो गया है
एक तपस्वी सा मौन की साधना में
लीन है
इसे यह किसी को पर दिखाता नहीं
यह भेद केवल ये ही जानता है
किसी को किसी बात से कोई
मतलब नहीं होता
वह यह सच भी जान चुका है।


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