बेमकसद आवाजों के घेरों को तोड़कर


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क्या कहूं

कई बार कुछ भी समझ नहीं आता 

आवाजों के शोर में

सच्चाई की आवाज दब गई है

उसे कोई सुनता नहीं

कोई सुनना पसंद करता नहीं

नकार देते हैं उस सच्ची बात और

उस सच्चे आदमी को

एक सिरे से किसी अछूत की तरह

झूठ, फरेब, आडंबर

इस तरह का ही बहुत कुछ

हर किसी को बहुत लुभा रहा है

मुंह से लार टपकती है सबकी जैसे

कोई स्वादिष्ट मिठाई खाने को मिल

रही है

ऐसी मानसिक विकृतियों का

क्या इलाज है

मेरे पास तो नहीं है

आजकल किसी को न

कोई कुछ समझा सकता है और

न ही कोई खुद को रत्ती भर भी

बदलने को तैयार होता है

एक ही तरीका है कि ऐसी

बेमकसद आवाजों के घेरों को

तोड़कर उनसे खुद को बाहर

निकाला जाये और

खामोशी से अपना ही कोई

एक रोशनी भरा सफर

एक रोशन मंजिल लिये

तय किया जाये।


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