बिना अर्थ की शब्दावली को अपने मन मुताबिक ढालना पड़ता है एक अर्थ के नये स्वरूप में
मेरे सामने जो कोई भी है
गर वह है एक दर्पण तो
उसमें झांकने पर
मुझे मेरी ही छवि दिखेगी
सामने मेरे जो कोई हो
वह कभी हो सकता है
ध्यान मुद्रा में
कभी हो सकता है
सदमे में
कभी हो सकता है
गहरे दुख में डूबा हुआ
तभी मौन तो
कभी खामोश
यह भी हो सकता है कि
वह बहुत बातूनी हो
एक बार जो बोलना शुरू करता हो तो बस बोलता ही जाता हो
कहीं रुकता ही न हो
उसे चुप कराने का कोई उपाय
खोजना पड़ता हो
उससे दूर भगाने का जुगाड़ करना
पड़ता हो
कानों में अंगुली या तेल डालकर
बैठना पड़ता हो
रुई भी ठूंसकर बैठ सकता है कोई लेकिन
उसने जो कहा
वह तुमने कितना सुना या
जिसने कुछ भी नहीं कहा तो क्या
तुमने उसकी भाषा चाहे फिर वह थी आंखों की या उसके दिल की को
सुना या
फिर किसी की बातचीत का अधिकतर नहीं होता कोई मकसद
कोई बोलता भी रहे लगातार तो
उसे ध्यानपूर्वक कोई सुनता नहीं
किसी की बातें
किसी के वाक्य
किसी के शब्द
किसी के भाव
किसी की सांकेतिक भाषा
किसी के इशारे
किसी की बॉडी लैंग्वेज यानी शरीर की भाषा
किसी के चेहरे की अभिव्यक्ति
क्या यह सब कुछ ही समय के
अति तीव्र प्रवाह में अपना उद्देश्य
और अर्थ नहीं खोते जा रहे
किसी एक या दो या तीन शब्दों तक क्या सीमित रहें
यह तथ्य तो हर शब्द के साथ ही
उजागर हो रहा है
यह आज के युग की एक कड़वी
सच्चाई है
शब्दों के अर्थ खुद ही
समझने पड़ते हैं
ढूंढने पड़ते हैं
आवश्यकतानुसार तय करने पड़ते हैं किसी की शब्दावली चाहे बिना
अर्थ की कैसी भी हो
उसे अपने मन मुताबिक
एक अर्थ के नये स्वरूप में
ढालना पड़ता है कहीं खुद की
अंतरात्मा को प्रसन्न करने के लिए
खुद को इन बेमकसद आवाजों
के शोर में गुम होने से बचाने
के लिए और
अपने जिस्म में पलती एक आत्मा को निरंतर पोषित करने और
जीवित रखने के लिए।
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