बस वही मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक


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उम्र बढ़ती है तो
आदमी घर की चहारदीवारी से
कम बाहर निकलता है
कभी तन साथ नहीं देता
कभी मन तो
कभी आंतरिक और बाह्य
परिस्थितियां
ऐसे बहुत से कारक हैं
इसका परिणाम कि घर के भीतर ही
कहीं बल्कि
एक कमरे में ही जिंदगी कैद होकर
रह जाती है
कभी कभार
घर से बाहर निकलने की हिम्मत
कर भी लो तो
सीधे सपाट रास्तों की जो
पहुंचा दें हिफाजत से
अपने किसी अजीज दोस्त के घर की याद आती है
कोई भूले भटके पूछे कि
घर से बाहर निकलकर घूमने
कहां कहां जाती हो तो
मैं अक्सर यही जवाब देती हूं कि  
और कहां
बस वही मुल्ला की दौड़ मस्जिद
तक
सच में जैसे जैसे उम्र बढ़ती है
जो कुछ भी होता है विस्तृत
वह सिमटने लगता है
एक सीमित दायरे में कैद होने
लगता है
अपनी ही हदों को पहचानने
लगता है और
उनसे बेइंतहा मोहब्बत करने लगता है।


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