आज भी
जैसे हर रोज होती है
सुबह हुई है
सूरज भी अपने समय पर उदित हुआ है
उसका प्रकाश चारों ओर फैला है
उसका कोई भी हिस्सा लेश मात्र भी बादल के टुकड़े से नहीं ढका है
कहने का तात्पर्य यह है कि
वह अपनी आभामंडल का
सर्वोच्च सौंदर्य
चारों दिशाओं में बिखेर रहा है
मेरे कमरे की खिड़की की ग्रिल
पर सटी महीन जाली से छनकर
उसकी किरणें मेरे मुख और
पूरी देह जो कुछ
खुली और कुछ वस्त्र आदि से ढकी है पर पड़ रही हैं लेकिन
मुझे वह प्रकाशित नहीं कर रही हैं
कोई ऊर्जा प्रदान नहीं कर रही हैं
रोशनी का कोई फूल मेरे हाथों में
नहीं पकड़ा रही हैं
सूरज इस जग के अंधेरे को तो
दूर करने में सक्षम है लेकिन
मेरे मन के जंगल में घर कर गये
गहन अंधकार का क्या
इसे कौन सा सूरज या
उसका प्रकाश दूर करेगा
मैं तैयार हूं मानसिक रूप से
रात के चांद की रोशनी का
स्वागत करने के लिए भी या
किसी छोटे से दीये की
ज्योति या
कोई भी
बस वह मेरी इस समस्या को
सुलझाने में मेरा साथ दे
यह समस्या जल्द ही सुलझ जायेगी
बहुत अधिक समय नहीं लेगी
बस कोई अंधकार को दूर करके प्रकाश को लाने का मेरे साथ मिलकर जरा सा प्रयास करे।
0 Comments