पारंपरिक और समकालीन – इन दोनों का उद्देश्य एक ही


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कोई मकान

कोई पलंग

कोई कुर्सी

कोई डिजाइन

कोई प्रबंधन

कुछ भी हो पुराना

पारंपरिक

कुछ बरसों पहले का निर्मित

क्या सच में कोई बताये कि

क्या वह हमें भाता नहीं है

उसके प्रति हमारी आस्था नहीं है दीवानगी नहीं है

क्या उसे देख हम पुराने समय में लौट नहीं जाते हैं

हम पुराने मंदिर, इमारतें, महल, किले, संग्रहालय आदि देखने

अपनी परंपराओं को समझने

अपनी विभिन्न प्रकार की कलाओं, शैलियों, सभ्यताओं आदि को

जानने के लिए

क्या इनका समय-समय पर भ्रमण नहीं करते

इनसे एक जुड़ाव का अनुभव नहीं करते इनसे एक दिल और आत्मा का

रिश्ता नहीं जोड़ते

आज की तारीख में चाहे हम हो

एक नये स्वरूप में लेकिन ढांचा हमारा वही पुराना आधार लिए होता है

समय के साथ परिवर्तन होते रहते हैं लेकिन

हर किसी चीज की अपनी सुंदरता होती है

वह खुद में पूर्ण होती है

कुछ भी अपूर्ण नहीं

आवश्यकताओं के अनुसार हम कुछ भी बदलाव 

किसी भी स्तर पर लाने के लिए बाध्य होते हैं

एक मकान रहने के लिए एक स्थान होता है

चाहे वह हो पारंपरिक या फिर आज के समय का

उद्देश्य उसका एक ही है

हां यह अवश्य है कि हम उसे अपने साधनों, संसाधनों, 

आवश्यकताओं आदि के अनुरूप अधिक आरामदायक बना सकते हैं

नई विकसित तकनीकों का भी उपयोग कर सकते हैं

जो कुछ जितना अधिक पुराना है

वह उतना श्रेष्ठ, लुभावना और मजबूत है पारंपरिक और समकालीन

इन दोनों का अपना महत्व है, अस्तित्व है, स्थायित्व है

आपस में इनकी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं।


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