पानी की स्याही से
कोरे कागज पर
लिख रही हूं
अपने दिल की कहानी
मेज पर गुलदस्ते में सजे
फूलों सी ही महकती थी कभी
मेरी जिंदगानी
जो कुछ भी लिखूंगी
उसकी गूंज
दूर तलक जायेगी लेकिन
पत्थर की शिलाओं से
टकराकर
वापिस मेरे पास ही लौटकर आयेगी कौन सुनता है
कभी
इस भरी पूरी दुनिया में
किसी के दिल की दास्तान
सुनते भी हैं कभी कभार
कुछ लोग तो
नहीं देते आपकी बातों पर
जरा सा भी ध्यान
जाहिर करते हैं कि
जैसे गौर से सुन रहे हैं लेकिन
वो अपने ही ख्यालों में उलझे
आपसे दूर होते हैं
जो कुछ उतरेगा
इन कागज के पन्नों पर
वह मुझे ही पढ़ना है
मुझे ही कहना है
मुझे ही सुनना है
मुझे ही समझना है
मुझे ही मनन करना है
इस कागज की बनाकर फिर
किश्ती
उम्र के दरिया को उसमें होकर सवार मुझे अकेले ही उसे पार करना है।
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