सूरज तपिश दे
आग न बरसाये तो
मैं घर से बाहर निकलूं और
किसी रास्ते पर चलने की हिम्मत जुटा पाऊं
यूं तो मेरा घर भी
आग का एक धधकता गोला ही है
घर से बाहर निकलकर
इस दुनिया की भीड़ को देखूं तो
एक शख्स मिलता नहीं ऐसा जो
मेरी ही तरह तन्हा और भोला हो
शिव शंकर की जटाओं से बांध लूं खुद को और
कैद कर लूं
स्वयं को अपने मन के मंदिर के
अहाते में
पहले आग जलाती थी
अब बुझते हुए दीये की बाती की लौ की तपिश भी शायद मुझे जलाकर राख करने के लिए
तत्पर सी दिखती है।
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