जमीन की सतह पर
आज नहीं खड़ी हूं मैं
एक ऊंची बिल्डिंग के टॉप फ्लोर पर हूं
कमरे की खिड़की से बाहर का नजारा एक कश्मीर की वादी सा ही
बेहद खूबसूरत दिख रहा है
शाम का डूबता सूरज
छत से
ऐसा लग रहा था कि
मुझे ही जैसे निगल जायेगा और
मुझे एक गुब्बारा जानते हुए
मेरे भीतर भरे हुए अहंकार की हवा निकालकर मुझे हल्का करते हुए
हल्का भी शायद किसी चिड़िया के परों सा
नीचे मिट्टी वह भी पानी पड़ी
यानी दलदली, गीली,
सब कुछ खुद में सोखने वाली
तुम्हारे अस्तित्व का एक-एक कतरा
रक्त की तरह निचोड़कर
तुम्हें मिट्टी में मिला देने वाली
अपना जैसा ही बना देने वाली
अपना रूप तुम्हें अंततः प्रदान करने वाली
सड़क पर दौड़ती जिंदगी जैसे बस दौड़ी चली जा रही थी बेपरवाह
तुम्हें भी भुला रही थी, खुद को भी
और शायद अपनी मंजिल को भी
दूर तक फैली बस्ती एक सितारों का जहां सी नजर आ रही थी
पहाड़ कहीं थे या नहीं लेकिन
मुझे नजर आ रहे थे
मिट्टी के टीले थे या
वह थे बादलों के टुकड़े
सीधे तने खड़े दरख्तों के मंजर थे या
घर या मकान थे गगन को
चूमते हुए बहुत ही ऊंचे और लंबे
एक पहाड़ी इलाके का अहसास सा हो रहा था और
यह भी प्रतीत हो रहा था कि
जैसे मेरी आवाज यह पर्वत श्रृंखला
सुन रही है
जो मैं मुंह से बोल रही हूं वह भी और
जो दिल से कहना चाह रही हूं
वह भी मेरी आवाज की गूंज पर्वतों से टकराकर लौटकर
मेरे कानों तक पहुंच रही थी
मुझे जैसे जो मैं सुनना चाहती हूं
वही कहना चाह रही थी
पर्वत मुझे दूर खड़े पुकार रहे थे
अपने पास बुला रहे थे
एक कदम आगे बढ़ाओ फिर
दूसरा
आहिस्ता आहिस्ता सही
समय चाहे जितना मर्जी
लगाओ लेकिन
हमारे पास पहुंच जाओ
नीचे ही फिर खड़े मत रह जाना
तुम्हें पर्वत पर चढ़ने का भी
हौसला खुद में जुटाना होगा और
इसके शिखर तक पहुंचना होगा
ऐसा ही कुछ कह रहे थे
तुम एक नया सफर पर्वतों के क्षेत्र का तय करो और
एक नया अनुभव प्राप्त करो
पर्वत के शिखर पर पहुंचने पर
पर्वतों के राजा का मुझसे वायदा था कि
फिर वह मुझे आसमान तक ही नहीं उसके चांद तक ही नहीं
आसमान और उसके चांद के पार
जाने का रास्ता भी बतायेंगे
शायद फिर वहां भी मिल जाये
एक नई पर्वतमाला मुझे पुकारते हुए
मुझमें विश्वास की एक ज्योत जगाते हुए
मुझे बेइंतहा प्यार और दुलार करके कहीं अपना बनाते हुए।
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