निर्वाण


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सांसारिक दुखों से मुक्ति तो
इस संसार का हर व्यक्ति चाहता है
परम आनंद और शांति का
अनुभव करना भी हितकर है
अज्ञान, लालसा और घृणा की अग्नि को
बुझाना भी श्रेयस्कर कार्य है लेकिन
जन्म, मरण या पुनर्जन्म के चक्र से
मुक्ति पा जाने का संघर्ष क्यों?
इस इच्छा को तो कभी फलीभूत नहीं होना
चाहिए
ऐसा हुआ तो एक समय बिंदु पर  
इस सृष्टि का ही पूर्ण रूप से अंत हो
जायेगा
यह धारणा नकारात्मक दृष्टिकोण को
दर्शाती है
जीवन एक जटिल पहेली है जो
एक जन्म में हल नहीं हो सकती
इसे समझने के लिए तो
कई जन्म लेने होंगे
कुछ भी कभी खत्म नहीं होता
बस उसका रूप बदल जाता है
भगवान अवतार के रूप में
अवतरित होकर
इस जग का कल्याण करें
यह इच्छा जब कभी पूर्ण नहीं होती तो
मनुष्य का पुनर्जन्म न हो या
वह जन्म मरण के चक्र से मुक्ति
पाकर
निर्वाण प्राप्त करे
यह मानव की इच्छा क्यों?
यह विचारों में विरोधाभास क्यों?
यह सरल जीवन को
हर समय जटिल बनाने का
प्रयास क्यों?


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