अतीत में ध्वनि तो विद्यमान थी
तभी तो
वर्तमान में उसकी प्रतिध्वनि
दिखाई पड़ती है
सुनाई पड़ती है
महसूस होती है
अंतर्मन में उतरती है
एक साध्वी की मौन साधना सी शीतलता प्रदान करती है
कोमलता का अहसास कराती है
यादों के भंवर से उबारती है
पोखर के जल पर तैरते
कंवल की पंखुड़ियों पर
आसन लगाकर
एक मछली की आंख पर निगाह टिकाकर
जीवन का लक्ष्य निर्धारित करवाती है
मैं कौन थी जब था तू मेरे साथ
मैं कौन हूं जब तू नहीं है मेरे साथ का बोध कराती है।
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