कहने को तो
वह सब अपने थे पर
अपने कहां थे
जमीं से आसमां
दिखता है पास लेकिन
क्या वह सच में पास है
करीब है
गले लगाने की उसे
कोई संभावना दिखती है
उससे मिलन की कोई उम्मीद
मन में एक दीपक सी जो जलती है
वह सितारों के नजारों की तरह
कहीं मोहब्बत के सफर में टिमटिमाती नजर आती है
सब भ्रम है
न जमीं उठती है
आसमां को छूने के लिए
न आसमां उतरता है
जमीं को चूमने के लिए
दोनों के दिलों के दरमियान
दूरी इतनी है कि
चांद सितारों की कर दो चाहे
कितनी भी बारिश क्यों नहीं
दोनों की आत्मायें कहीं एक होती नहीं दिखती हैं।
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